Muslim women can seek maintenance: सुप्रीम कोर्ट ने आज (10 जुलाई) कहा कि मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अपने पति के खिलाफ भरण-पोषण के लिए याचिका दायर करने की हकदार है। जस्टिस BV नागरत्ना और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने CrPC की धारा 125 के तहत अपनी तलाकशुदा पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ता देने के निर्देश के खिलाफ एक मुस्लिम व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने माना कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 धर्मनिरपेक्ष कानून पर हावी नहीं होगा।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “हम आपराधिक अपील को इस निष्कर्ष के साथ खारिज कर रहे हैं कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी महिलाओं पर लागू होगी, न कि सिर्फ विवाहित महिलाओं पर”।
#WATCH | On Supreme Court’s observation that Muslim woman can seek maintenance from husband u/s 125 of CrPC, founder member of All Indian Muslim Personal Law Board, Mohd. Sulaiman says, “On the judgement of the Supreme Court on the Shah Bano case in 1985, the board held a moment… pic.twitter.com/y1MQAAhCfh
— ANI (@ANI) July 10, 2024
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ऑल इंडियन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के संस्थापक सदस्य मो. सुलेमान ने बयान देते हुए कहा, “1985 में शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बोर्ड ने एक क्षण रुका जिससे एक नया कानून अस्तित्व में आया। लेकिन, उस कानून की व्याख्या उच्च न्यायपालिका द्वारा की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो लोग धारा 125 के तहत राहत चाहते हैं उन्हें वह मिलेगी और मुस्लिम समुदाय को इससे छूट नहीं है। न्यायपालिका का मानना है कि महिलाओं के लिए धार्मिक गारंटी पर्याप्त नहीं है”।
आगे मो. सुलेमान ने कहा, “न्यायपालिका की यह मानसिकता भी एक भूमिका निभाती है हालिया फैसले में मुझे यह कहना है कि जो बहनें इस्लामी, शरीयत नियमों के तहत तलाक के संबंध में फैसला चाहती हैं, उनके लिए यह बेहतर होगा, जो सोचते हैं कि उन्हें अदालत के माध्यम से गुजारा भत्ता मिल सकता है, वे वहां जा सकते हैं, लेकिन एक मुद्दा है। अलग होने के बाद भी तलाक नहीं होता है और महिला शादी नहीं कर सकती है इसलिए यह एक अप्राकृतिक दृष्टिकोण है…”।
